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किसान आंदोलन …. शाहीन बाग़ पार्ट टू (शुरू )

by On The Dot
November 28, 2020
Reading Time: 1 min read
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किसान आंदोलन …. शाहीन बाग़ पार्ट टू (शुरू )

कृषि प्रधान देश में किसान आंदोलन  के नाम पर राजनीती होती रही है और किसानों को भ्रमित करते रहे हैं। परंतु कल से जिस तरह के भयावह दृश्य आ रहे हैं, वह अत्यंत भयानक और विचारणीय है। अपनी बात का प्रारंभ एक बयान से करता हूं, जिससे विषय स्पष्ट हो जायेगा, क्योकि  यह  बयान बहुत खतरनाक और गंभीर है। इसमें किसान आंदोलन में शामिल एक व्यक्ति ने जिस प्रकार धमकी दी है वो सुनकर आप चौंक जाएंगे कि इस आंदोलन में अब खालिस्तान की भी एंट्री हो गई है।

वीडियो में देखिये यह व्यक्ति साफ तौर पर कह रहा है कि जो हाल इंदिरा गांधी का हुआ था वही मोदी का भी होगा। ये बयान किसी किसान का नहीं हो सकता है। ये खालिस्तान की भाषा है और अब इस आंदोलन से आतंक और साजिश की गंध आ रही है। वहीं पंजाब के बरनाला से आई एक तस्वीर में प्रदर्शनकारियों के हाथ में भिंडरावाला की फोटो नजर आ रही है जी हां,  भिंडरावाला की जो खालिस्तानी आतंकवादी था और उसे ही स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था। इस ऑपरेशन के बाद ही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उन्हीं के सिख सुरक्षा कर्मियों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी । यानी देश में एक बार फिर 1984 वाला माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

स्वाभाविक है ऐसी धमकियों वाले आंदोलन को आप किसानों का आंदोलन नहीं कह सकते। कुछ वर्षों पहले महाराष्ट्र में किसान आंदोलन हुआ था, लाखों किसान महाराष्ट्र और  देश के विभिन  हिस्सों से आये थे। 5-7 किलोमीटर तक किसानों का कोई भी उपद्रव नहीं हुआ ना ही कोई देश विरोधी नारे लगे। अभी जो आंदोलन किसान आंदोलन के नाम पर किया जा रहा है, वह  कतई आंदोलन नहीं है या यह कहे अब इस आंदोलन को राजनीतिक पार्टियों और खालिस्तानियों ने हाईजैक कर लिया है।

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राष्ट्र की राजधानी में पंजाब से आए तक़रीबन 10 हजार किसान नए कृषि कानूनों के विरोध में पहुँचकर संसद का घेराव करना चाहते थे।  शुक्रवार को जब ये किसान दिल्ली के पास सिंधु बॉर्डर पर पहुंचे तो इन्हें वहां रोक दिया गया। आपको पता होगा फिर भी बता दूं कि सिंधु बॉर्डर दिल्ली और हरियाणा को जोड़ता है और इस बॉर्डर से देश की संसद की दूरी 36 किलोमीटर है। किसानों के इस प्रदर्शन के दौरान इस बॉर्डर पर जमकर हंगामा हुआ, कई जगहों पर हिंसा भी हुई, इस दौरान तलवारें लहराई गईं, पत्थर बरसाए गए, बैरिकेडिंग को तोड़ा गया और यहां तक कि इन्हें रोक रहे पुलिसवालों को लाठी डंडों से मारने की कोशिश भी की गई। हालांकि इन सबके बावजूद इन किसानों को दिल्ली में प्रवेश दे दिया गया है।अब ये किसान दिल्ली के बुराड़ी मैदान में एकत्रित होकर प्रदर्शन कर सकते हैं।  देश की संसद से बुराड़ी मैदान की दूरी सिर्फ 20 किलोमीटर है, हालांकि अभी तक इस मैदान में सिर्फ 500 किसानों के पहुंचने की खबर है। यह तब हो रहा है जब देश में आज़ादी नहीं है सोचिये।

देश की कई राजनीतिक पार्टियां इन किसानों के कंधे पर सवार होकर वोटों से अपने फासले को कम करना चाहती हैं। खालिस्तान जैसे आतंकवादी संगठन भी इन किसानों का फायदा उठा रहे हैं और इस आंदोलन में जहर घोलने की कोशिश कर रहे हैं। सरल व स्पष्ट शब्दों में कहूं तो  किसानों के आंदोलन में वोट बैंक की राजनीति करने वाली पार्टियों का एक बहुत बड़ा रोल है।  ट्रैक्टर को जलाना, ट्रैक्टर से गाड़ियों को खींचना, आंदोलन पर अंग्रेजी में प्रेस नोट जारी करना, अखबारों में विज्ञापन निकालना और Hashtag Trend कराना, ये सब काम किसान सिर्फ अपनी ताकत के दम पर नहीं कर सकते। ये सभी तौर-तरीके और तस्वीरें इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि इस आंदोलन को राजनीतिक पार्टियों ने टेक ओवर कर लिया है। इसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल उठा रहे हैं। खतरनाक बात यह है  इसमें खालिस्तान जैसे आतंकवादी संगठनों की भी एंट्री हो चुकी है जो ये धमकी दे रहे हैं कि जो हाल इंदिरा गांधी का हुआ था वही प्रधानमंत्री मोदी का भी होगा। ये खतरनाक बयान सुनकर आपको समझ आ जाना चाहिए कि ये आंदोलन अब दिशाहीन हो गया है।

देश का अन्नदाता देश की भलाई के लिए बने नियमों को नहीं तोड़ सकता यानी पुलिस के साथ हिंसा में सभी किसान शामिल नहीं और ना ही वो इसका समर्थन करते हैं।  हालांकि अब इस आंदोलन में हिंसा और नफरत शामिल हो गई है और इससे किसानों का हित होने की संभावना बहुत कम है। कुछ समय उपरांत उजागर होगा की यह किस तरह किसान आंदोलन सुनियोजित तरीके से शाहीन बाग़ पार्ट 2 था इसके अलावा कुछ नहीं।

–आदित्य तिक्कू

 

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