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गांधी से ‘बापू’ तक

by On The Dot
January 30, 2021
Reading Time: 1 min read
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गांधी से ‘बापू’ तक

File Photo

तीस जनवरी वो दिन है जिस दिन अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। गांधी जी ने अपना सत्याग्रह चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के लिए किया था। उन्होंने अहिंसा की ताकत से ब्रिटिश हुकूमत को किसानों के आगे झुकने को मजबूर कर दिया और यहीं से गांधी को मिला बापू का दर्जा।

बिहार के पश्चिमोत्तर इलाके में स्थित चंपारण में अंग्रेजों ने तीनकठिया प्रणाली लागू कर दी थी। इसके तहत एक बीघा जमीन में तीन कट्ठा खेत में नील लगाना किसानों के लिए अनिवार्य कर दिया गया। पूरे देश में बंगाल के अलावा यहीं पर नील की खेती होती थी। किसानों को इस बेवजह की मेहनत के बदले में कुछ भी नहीं मिलता था। वर्ष 1907 में शोषण से भड़के किसानों ने हरदिया कोठी के प्रबंधक ब्रूमफील्ड को घेर लिया और लाठी से पीटकर उनकी जान ले ली। इसकी वजह से अंग्रेजी सरकार और सख्त हो गई।

शुरुआत में किसानों का नेतृत्व शेख गुलाम ने किया, जिन्हें ब्रूमफील्ड की हत्या के बाद गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद इसकी कमान राजकुमार शुक्ल ने संभाली। शुक्ल इलाके के एक समृद्ध किसान थे। उन्होंने शोषण की इस व्यवस्था का पुरजोर विरोध किया, मगर काफी प्रयास करने के बाद भी कुछ न हुआ तो उन्होंने बाल गंगाधर तिलक को बुलाने के लिए कांग्रेस के लखनऊ कांग्रेस में जाने का फैसला लिया। वहां जाने पर उन्हें गांधी जी को जोड़ने का सुझाव मिला और उन्होंने गांधी जी से संपर्क साधा।

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महात्मा गांधी ने 15 अप्रैल, 1917 को मोतीहारी में कदम रखा और वहीं से शुरू हुआ, नील किसानों की मुक्ति का सफर। इसी संघर्ष के दौरान स्थानीय किसानों ने गांधी को बापू के नाम से संबोधित किया। चंपारण में किसानों के समर्थन में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की शुरुआत की। इसे चंपारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। 

गांधीजी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह था। बापू ने जगह-जगह घूमकर किसानों से बात कर उनपर हुए जुल्मों को कलमबद्ध किया और उन्हें 4 जून को लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गैट को दे दिया गया। इन बयानों के आधार पर 10 जून को चंपारण कृषि जांच समिति बनी, जिसके एक सदस्य बापू भी थे। काफी विचार-विमर्श के बाद कमेटी ने अक्तूबर में रिपोर्ट जमा की। इस रिपोर्ट के आधार पर 4 मार्च 1918 को गवर्नर-जनरल ने चंपारण एग्रेरियन बिल पर हस्ताक्षर किए और 135 सालों से चली आ रही नील की जबरन खेती की व्यवस्था का अंत हुआ।

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